Monday, December 15, 2014

जहाँ न अमृत न विष, न स्वर्ग न नर्क,...
यात्राओं का अंत नहीं होता... और इस अनंत यात्रा में भले ही महादेव को देख न पाओ किन्तु वे हमेशा तुम्हारे साथ हैं.... और तुम्हे अपने भीतर ही उन्हें प्राप्त करना है ....
हर आरम्भ का वे ही अंत हैं और हर अंत का आरम्भा उनसे ही होगा...

Tuesday, December 9, 2014

                             जगदीस चन्द्र बसु

जगदीश चन्द्र बसु भारत के बहुत बड़े वैज्ञानिक थे.
उन्होंने पेड़-पौधों में संवेधनशीलता की खोज की थी.
इसी कारणवश उन्हें यूरोप के लोगों ने नोबेल पुरस्कार से समान्नित करने को कहा था.
अब ये बात ज्यादा किसी को पता नहीं है की उन्होंने ये खोज कैसे की.
मैं उल्लेख करता हूँ.......

उन्होंने अपने घर के दो कोने में एक ही प्रकार के कुछ पौधे लगायें जिसमें उन्होंने एक ही प्रकार के जल से सींचना, गुणगान, देख-भाल करना आदि सभी करते थे.

कितुं अंतर ये करते थे की एक कोने वाले पौधे को खूब बुरा-भला कहते थे, गलियाँ देते थें, जैसे की तुम किसी काम के नहीं हो, तुम्हारा रंग रूप अच्छा नहीं है, तुम्हारे पत्तियों का रंग अच्छा नहीं है अदि-आदि कहा करते थे........

और दुसरे कोने वाले पौधे को खूब अच्छा-अच्छा बोलते थे, जैसे की तुम बहुत काम के हो, तुम्हारा रंग रूप बहुत ही मनमोहक और प्रिय है, तुम्हारे पत्तियों का रंग बहुत ही अच्छा जिससे की तुमसे बहुत सारी औषधियाँ बनायीं जा सकतीं है आदि-आदि कहा करते थे.....

तो ऐसा उन्होंने लगभग छः महीने तक किया. और पाया की जिस कोने वाले पौधे को वो बुरा-भला कहतें थे वो सुख गए और जिस कोने वाले पौधे को वो अच्छा-भला कहते थे उनमे और नयी-नयी पत्तियां और पुष्प लग गएँ. और इस प्रकार से उन्होंने जाना की पेड़-पौधों में भी संवेदनशीलता होती, वे भी सुख-दुःख का अनुभव करतें हैं.....

ये कहानी बताने के पीछे मेरा सिर्फ यही उद्देश्य है की हम भारत के लोगों पर भी अंग्रेज कुछ यही भावना डालकर चले गए हैं की हम किसी काम के नहीं हैं, और हम मानसिक रूप से अभी तक यही सोचते है की वे हमसे ज्यादा कुछ आगे हैं....    हम कुछ भी नहीं कर सकतें है....     हम कुछ नया नहीं कर सकतें हैं....

किन्तु वो हमसे आगे नहीं अपितु हम उनसे बहुत आगे हैं...

तो मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगा की हमें इस मानसिकता से बाहर आकर काम करना होगा...  
यदि कोई देश अपना प्रोद्योगिकी(technology) हमें तभी प्रदान करता है या तो उसके पास कोई नयी प्रोद्यागिकी आ जाती है या तो उसकी आवश्यकता उसको अब नहीं है...........


अपने भारत के नागरिक होने पर गर्व का अनुभव करें....

Sunday, November 23, 2014

             CHEMISTRY का चक्कर
             
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ना ये  CHEMISTRY होती , ना मैं इसका STUDENT होता!
ना ये LABORATORY होती, ना ही मेरे HEART का  ACCIDENT होता !
अभी PRACTICAL में नज़र आई 1 सुन्दर सी लड़की!
सुन्दर थी नाक उसकी TEST TUBE जैसी!
बातों में उस के GLUCOSE की मिठास थी!
साँसों में ETHER की खुश्बू भी साथ थी!
आँखों में झलकता था Ku6 इस तरह का प्यार!
बिन पिए हो जाता था ALCOHAL का खुमार!
BENZENE सा होता थी उसकी PRESENCE का एहसास!
अंधेरे में होता था RADIUM का एहसास!
नज़रें मिले REACTION हुआ!
Ku6
इस तरह love का PRODUCTION हुआ!
लगने लगे उस के घर के चक्कर ऐसे!
NUCLEUS
के GRID ELECTRON हो जैसे!
उस दिन हमारे TEST का CONFIRMATION हुआ!
जिस दिन उस के पापा से हमारा INTRODUCTION हुआ!
सुन कर हमारी बात वो ऐसे उछल पड़े!
IGNITION TUBE
में जैसे SODIUM भड़क उठे!
वे बोले होश में आओ पहचानों अपनी औकात!
IRON
मिल नहीं सकता GOLD के साथ!
ये सुनकर टुटा हमारे अरमानों भरा BEAKER!
और हम चुप रहे BENZALDEHYDE का कड़वा घूंट पी कर!
अब उसकी यादों के सिवा हमारा काम चलता था!
और LAB में हमारे के सिवा Ku6 जलता था!
जीवन हो गयी UNSATURATED HYDRO CARBON की तरह!
और हम FORTE है आवारा HYDROGEN की तरह!
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AMIT SINGH B.TECH

मन की शांति

माता-पिता से ही सिर्फ बच्चे नहीं सीखते अपितु माता-पिता भी बच्चे से बहुत कुछ सिखतें हैं.
यदि हमारे मन में समर्पण की भावना आ जाती है तो हमें सब कुछ आसानी प्राप्त हो सकती है.
और इस संसार में वही एक सफल व्यक्ति होता है जो की एक अच्छा सुनने वाला होता है और उसपे अमल भी करता हो.
हमें हमेशा ही सदा सबके कल्याण के बारे में ही सोचना चाहिए.
ऐसा करने से हमें अत्यंत मन में ख़ुशी और शांति की प्राप्ति होती है और हम पुण्य के भी भागी बनतें हैं.